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अँहँऽ... अँहँऽ... / यात्री

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अँहँऽ अँहँऽ नहि चाहिअइन, नहि चाहिअइन
ऐटमो आयुध नहि चाहिअइन हमरा भगवान केँ
शंख - चक्र - गदा - पद्म...
बझले रहइ छनि चारू हाथ
अँहँ’ अँहँ’ खागि नहि छइन आन कोनो हथियारक
सेहो कीत सूतल छथिन एखन
के उठओतइन हुनका देव - उठानसँ पूर्व?
अँहँ’ अँहँ’ छाड़ि दिअउन एखन
पाछाँ बरू भेट क’ लेबइन कहिओ!

अँहँ’ अँहँ’ नहि चाहिअइन, नहि चाहिअइन
पद्मासना लक्ष्मी केँ सखा - पात
लगइ छनि हुनका बड्ड बेश अपन बज्र - बहीर कोखि
सृष्टिक आदिमेँ उएह छली
प्राचार्या परिवार नियोजन विद्याक
अँहँ’ अँहँ’ केओ नहि करिअइन आलोचना
बाँझे रहथु अहिना माता लक्ष्मी
उल्लूक सौभाग्य थीक हुनका देहक मइल
वेरक ऐवर्य थोक हुनक निर्माल्य
सात - समुद्र पार आन आन देशक अच्छोद सरोवर
होइत रहओ प्रतिफलित ओहिना हुनक स्मित-भास्वर ठोरसँ
पड़लि रहथु अनुर्वर, उदास, पेट - कान्ह देने
अपना देशक ई रत्नगर्भा भूमि हुनके उपेक्षाक मारल।

अँहँ’ अँहँ’ नहि टोकिअउन महास्थविर ब्रह्माकेँ
रहथुन हेड़ाएल ढीलक लीख जकां
हिनक पाकल दाढ़ीक बड़का जंगल मध्य
शत - सहस्त्र अनागत विश्वामित्र अहिना
पटपटाइत रहनु बरू अहिना चारू मुहँक आठोटा ठोर
अँहँ’ अँहँ’ जूनि राखी एको रती भरोस एहि बूढ़ बाबाक

बइसल रहथु अहिना भने प्रज्ञाकेँ द’ क’ तिलांजलि
अनंतशायी भगवान् विष्णुकेर नाभिकमलक मचानपर
इएह रहथीन खेहारने सरस्वतीकेँ...
बिसरतइ ककरा!
अँहँ’ अँहँ छाड़ि दिअनु हिनका!