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अख़्मातवा के लिए-1 / मरीना स्विताएवा

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ओ कविताओं में श्रेष्ठ रुलाई की कविता,
ओ श्वेत रात्रि की प्रेतात्मा,
रूस की ओर तुम भेज रही हो काले तूफ़ान,
तीरों की तरह तुम्हारी सिसकियाँ चुभ रही हैं हमारे भीतर।

और डरे हुए हम कह पाते हैं सिर्फ़ : उफ़्फ़ !
तुम्हारे नाम- आन्ना अख़्मातवा -की खाते हुए कसमें।
गहरी आह की तरह तुम्हारा नाम
डूब जाता है अतल में जिसका नहीं कोई नाम।

सौभाग्य है हमारा कि हम दोनों की
एक है धरती और एक ही आकाश।
तुम्हारी क्रूर नियति से जिसने खाई है चोट
लेटा है वह अमर्त्य
मृत्यु-शय्या पर।

गुम्बद जल रहे हैं मेरे गाते हुए नगर के
यायावर गायक आलोकित स्पास्स के गा रहा है गीत।
मैं भेंट करती हूँ तुम्हें, अख़्मातवा
अपना हृदय और सुरीली घंटियों का यह शहर।

रचनाकाल : 19 जुलाई 1916

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : वरयाम सिंह