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अगरू गन्ध रोई / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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1
साँझ हो गई
बन -बन भटकी
भूखी व प्यासी
रूपसी बंजारिन
पिया ! कद्र न जानी।
2
दीप जलाए
अँधियारे पथ में
दिए उजाले,
सदा हाथ जलाए
पाए दिल पे छाले।
3
आँख लगी थी
सुनी हूक प्रिया की
सपना टूटा,
निंदिया ऐसी उड़ी
उम्र भर न आई।
4
आहत मन
अगरू गन्ध रोई
मन्त्र सुबके
उदासी -भरा पर्व
अश्रु का आचमन।
5
प्राण खपाए
बरसों व्रत -पूजा
करके थके
आरती की थाली थी
लात मार पटकी।
6
प्राणों में जो था
उसे पा नहीं सके
द्वार गैर के
कभी जा नहीं सके,
प्रारब्ध में यही लिखा।