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अगर ख़ामोश रह कर अश्क पीना आ गया होता / अशोक रावत

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अगर ख़ामोश रह कर अश्क पीना आ गया होता,
तुम्हें भी सर उठा कर आज जीना आ गया होता.

उलझने में अगर तूफ़ान से देरी न की होती,
किनारे पर तुम्हारा भी सफ़ीना आ गया होता.

निडर हो कर जो अपनी राह पर चलते चले जाते,
तुम्हारी हर मुसीबत को पसीना आ गया होता.

अगर तुम छोड़ देते ख़्वाहिशों की जी हज़ूरी तो,
उसूलों से निभाने का करीना आ गया होता.

कसक को भूल जाते दर्द को मरहम बना लेते.
तुम्हें हर ज़ख़्म अपने आप सीना आ गया होता.

हमें भी क्या ज़रूरत थी कि हर पत्थर परखते हम,
निगाहों में अगर कोई नगीना आ गया होता.