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अजमतों के बोझ से घबरा गए / संजय मिश्रा 'शौक'

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अजमतों के बोझ से घबरा गए
सर उठाया था कि ठोकर खा गए

ले तो आए हैं उन्हें हम राह पर
हाँ, मगर दांतों पसीने आ गए

भूख इतनी थी कि अपने जिस्म से
मांस खुद नोचा, चबाया, खा गए

कैदखाने से रिहाई यूं मिली
हौसले जंजीर को पिघला गए

बज गया नक्कारा-ए-फ़तहे-अजीम
जंग से हम लौट कर घर आ गए

इक नई उम्मीद के झोंके मेरे
पाँव के छालों को फिर सहला गए

उन बुतों में जान हम ने डाल दी
दश्ते-तन्हाई में जो पथरा गए.

छीन ली जब ख्वाहिशों की ज़िन्दगी
पाँव खुद चादर के अंदर आ गए