भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अधपके अमरूद की तरह पृथ्वी / अशोक वाजपेयी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

खरगोश अँधेरे में
धीरे-धीरे कुतर रहे हैं पृथ्वी ।

पृथ्वी को ढोकर
धीरे-धीरे ले जा रही हैं चींटियाँ ।

अपने डंक पर साधे हुए पृथ्वी को
आगे बढ़ते जा रहे हैं बिच्छू ।

एक अधपके अमरूद की तरह
तोड़कर पृथ्वी को
हाथ में लिये है
मेरी बेटी ।

अँधेरे और उजाले में
सदियों से
अपना ठौर खोज रही है पृथ्वी

(रचनाकालः1985)