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अधिकार / बाल गंगाधर 'बागी'

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रोटी का अधिकार चाहिए कोई भीख नहीं
ये सपना साकार चाहिए कोई टीस नहीं
सदियों से संघर्ष की ज्वाला जलाएं हैं
अब सारा जहान चाहिए कोई द्वीप नहीं
जमींदारी व लाचारी का मेल क्या होगा
बंजर जमीं पर उगता है कोई गीत नहीं
वीरान दिल तड़पता है उदास मौसम पर
क्यों खुशियांे की आयी कोई रीत नहीं
हर बहार में वीरानी का नक्श1 कायम है2
‘बाग़ी’ हमेशा हंसी होती कोई प्रीत नहीं