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अधूरा / नवीन ठाकुर 'संधि'

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हे! फूल, तोंय सोची समझी केॅ करोॅ प्रीत,
मुरझैतौं पंखुड़ी तोरोॅ छोड़ी देतौं मीत।
गुणगुणाय केॅ तोरा सुनाय छौं गीत,
तोरा सें बढ़ाय लेली प्रीत।

तबतक चुसतौं जबतक निकलै छौं रस,
सुखलौं मधु तेॅ करतौं परहेज बस।
बादोॅ में पछतैभेॅ यहेॅ दुनिया रीत
हे! फूल, तोंय सोची समझी केॅ करोॅ प्रीत।

सब्भेॅ युगोॅ में सब्भेॅ रहलोॅ छै अधूरा,
कभियोॅ नॅ केकरोॅ होलोॅ छै पूरा।
समय एैला पर चोला सहित बदलै छै डेरा,
शास्त्र-साखी जिनगी में आबै छै फेरा।
चुनी लेॅ ‘‘संधि’’ चाटोॅ नै सीत,
हे! फूल, तोंय सोची समझी केॅ करोॅ प्रीत।