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अन्तर्दाह / पृष्ठ 26 / रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध'

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देखा निशिकर - वाहन पर
बैठे नभ में फिरते भी
देखा इस दुखित धरा पर
हिमकण - मोती धरते भी ।।१२६।।

जब तान मिलाता निर्झर
कुड्मल-किसलय के स्वर में
धीरे से गीत उठे तब
मेरे आकुल अंतर में ।।१२७।।

पथ पुण्य - प्रसून बिछे थे
उसके औचक हँसने से
कुम्भों से अर्घ्य ढुला था
दृग -कोरों के फँसने से ।।१२८।।

वह भ्रम, विभ्रम या सच था
या मनस नष्ट था मेरा
किस नीड़ में जाकर कोकिल
तू ने ले लिया बसेरा ? ।।१२९।।

उस में मैंने देखा था
अनुराग-सिन्धु लहराते
पर ,वासंती सुषमा में
स-विराग गीत को गाते ।।१३०।।