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अन्तिम छोर का मानव / भी० न० वणकर / मालिनी गौतम

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यूँ तो कुछ भी नहीं
लेकिन फिर भी सब कुछ हूँ

अन्तिम सिरे पर खड़ा हुआ आदमी हूँ
धड़, माथा,और हाथ बिना का
आकाशी टुकड़ा हूँ;
घूरे पर फेंका हुआ
ईंट-पत्थर, चिथड़ा और काँच का टुकड़ा हूँ

यातना, आकांक्षा
और उपेक्षित सूर्यमुखी हूँ
अपने अस्तित्व के सजग क्षणों में
गरजता सागर हूँ
लंगर डाल कर खड़ी हुई
एक अकेली नाव की अनुगूँज हूँ

जिस नाव में तुम हो
उस नाव का प्रवासी हूँ
मैं ही पाल हूँ, मैं ही नाविक हूँ
तारपीडो भी मैं ही हूँ

संदर्भों की साँस ले कर
ज़िन्दा रहने वाले लोगों के बीच,
मैं युगों से अकेला हूँ
इसलिए चुपचाप हूँ

यूँ तो कुछ भी नही
लेकिन फिर भी सब कुछ हूँ
अन्तिम सिरे पर खड़ा हुआ आदमी हूँ
   
अनुवाद : मालिनी गौतम