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अन्धा कुआँ है यह कोशिश / रवीन्द्र दास

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मैं जानता हूँ

अन्धा कुआँ है यह कोशिश

तुम्हारी ओर आने की

मैं जानता हूँ

मिटा दिया है तुमने मेरे नाम

हर उस जगह से

जहाँ भी फैल सकता है तुम्हारा विस्तार

मैं जानता हूँ यह भी

कि बस एक भूले हुए नाम से अधिक कुछ भी नहीं है

तुम्हारे लिए मेरा वजूद

बड़ी मेहनत से रची हुई अल्पना को जैसे

किसी शैतान बच्चे ने उजाड़ दिया हो

वैसे ही तो उजड़ गई है मेरी जिन्दगी

और शायद तुम्हारी भी

किन्तु शेष है तुम्हारे पास अभी भी

प्रतिशोध की तपिश

नहीं हो पाते होगे एकांत

विरूद्धवाद में होती है बड़ी उत्तेजना

ज़माने ने इसी का तो फायदा उठाया है

खल-नायक तो मैं था

वनवास मिला तुम्हे

आस-पास की हवाओं ने, फजाओं ने

जैसे सराहा हो तुम्हारे इस फैसले को

कुछ-कुछ ऐसा ही महसूस होता होगा तुम्हे

नहीं पहुँच पाउँगा तुम्हारे पास मैं

जानता हूँ

फिर भी आ रहा हूँ मैं तुम्हारी ओर

जानता हुआ

कि अन्धा कुआँ है यह कोशिश।