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अन्हरी बिलाय / नवीन ठाकुर 'संधि'

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कि कहबोॅ लाजोॅ रोॅ बात,
कहै छीं तेॅ, जाय छै जात।

हम्में पड़लां बीमार
खटिया पर पड़लोॅ छीं लचार
रात छेलै बड़ी गैर,
छर-छर पड़ै छेलैॅ झैर
खटिया कच-कच करै छै अन्हार रात।
कि कहबोॅ लाजोॅ रोॅ बात।

घरनी हमरा खूबेॅ मानै छै,
चौराय नुकाय केॅ दोसरौ के जानै छै,
बोलोॅ, अन्हरी बिलाय घरैं शिकार
मन्टा बाप कत्ते धधाय छोॅ बार-बार
मारलकी पीठी पर एक लात।
कि कहबोॅ लाजोॅ रोॅ बात।

मन्टा माय छै अैंचा तानोॅ,
हम्मेॅ छी एक आँखी रोॅ कांनोॅ।
हमरा दूहूॅ में खूब पटै छै
तोरा सिनी सोचनें की घटै छैॅ?
खूब दै छै हिनी ‘‘संधि’’ के साथ।
कि कहबोॅ लाजोॅ रोॅ बात।