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अपनी देह और इस संसार के बीच / मुइसेर येनिया

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मेरी जुल्फों में
निराशा बढ़ती ही जा रही है
जबकि भीतर ही हैं इनकी जड़ें

इसके केन्द्र में दमक रही हूँ मैं
पृथ्वी की तरह

यदि मैं अपनी स्म्रतियाँ एक तम्बू में रख दूँ
और खुद रहूँ दूसरे तम्बू में

मेरी आँखें गायब हो जाएँगी ....

मैं हूँ जैसे बाहर निकली हूँ किसी बीज से
मैं वापिस बीज में लौट जाऊँगी

मैं पदचिन्ह हूँ किसी घोड़े के नाल का
दिन के चेहरे पर बना हुआ

अपनी देह और इस संसार के बीच
मुझे दूरी रखनी चाहिए ।