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अपने-अपने युद्ध / लीलाधर जगूड़ी

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कभी दुनियादारी की तरह कभी दुकानदारी की तरह
चल रहे हैं युद्ध। युद्धों ने भी बदल लिए हैं फ़ैशन
मरने वाले मगर पहले की ही तरह
घर परिवार और दोस्तों को याद करते हुए मरते हैं

ऐसे समय में घायल ज़मीन से ऊपर आए हुए
कीड़े भी सोचते हैं पृथ्वी आकाश और उजाले के बारे में
जैसे कि समय के बारे में सोच रहे हों
लेकिन बीच में ही जीमने वालों की तरह कुछ पक्षी आ जाते हैं

एक से दूसरे अस्तित्व की भूख
खाओ-कमाओ का प्रसंग फड़-फड़ा पड़ता है

हर जगह से घाव, घात और मौत के समाचार हैं
कीड़े कभी भी इस धरती पर अकड़कर नहीं चल पाए
कीड़ों की मौत भी अपने सारे जीवन को याद करते हुए हुई है

उनके मरे हुए शरीर में मौजूद है
अपने को बचा न पाने की आख़िरी ऐंठन
जैसे वे अब भी पीछे की ओर ज़ोर मारकर
आगे की ओर सरक जाना चाहते हों ।