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अब अहल-ए-दिल हैं कि नायाब होते जाते हैं / निकहत बरेलवी

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अब अहल-ए-दिल हैं कि नायाब होते जाते हैं
ग़ुबार-ए-ख़ातिर अहबाब होते जाते हैं

तुम्हारे आने से कुछ इजि़्तराब कम होता
ये क्या कि और भी बेताब होते जाते हैं

सुकूँ-मआब समझते थे जिन किनारों को
सिमट के हल्क़ा-ए-गिर्दाब होते जाते हैं

हमें भी रात को दिन कहना आता जाता है
कि हम भी हामिल-ए-आदाब होते जाते हैं

हमें मिले न मिले ज़िंदगी मगर ‘निकहत’
सुना है ज़ीस्त के अस्बाब होते जाते हैं