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अब इस घर में / हम खड़े एकांत में / कुमार रवींद्र

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अब इस घर में
धूप नहीं आती है, भाई

ऊँचा हूआ कोट का गुंबद -
उसकी है लंबी परछाईं
बिना धूप घर के चेहरे पर
उग आई है गहरी झाँईं

आँगन में
गौरइया देती नहीं दिखाई

बित्ता भर आकाश सिर्फ़
गुंबद के पीछे से दिखता है
उस पर एक धुएँ का बादल
जोग लिखी पाती लिखता है

राजपथों पर
अच्छे दिन की फिरी दुहाई

रामराज की बात हुई कल
चौंके थे देवा जी घर के
लाये गये द्वार पूजन को
संत-पुजारी इधर-उधर के

नये मंत्र सुन
चौरे की तुलसी मुरझाई