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अब उस की याद सताने को बार बार आए / निकहत बरेलवी

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अब उस की याद सताने को बार बार आए
वो ज़िंदगी जो तिरे शहर में गुज़ार आए

ये बेबसी भी नहीं लुत्फ़-ए-इख़्तियार से कम
ख़ुदा करे न कभी दिल पे इख़्तियार आए

क़दम क़दम पे गुलिस्ताँ खिले थे रस्ते में
अजीब लोग हैं हम भी कि सू-ए-दार आए

न चहचहे न सुरूद-ए-शगुफ़्तगी न महक
किसे अब ऐसी बहारों पे ए‘तिबार आए

जुनूँ को अब के गरेबाँ से क्या मिलेगा कि हम
ब-फ़ैज़-ए-मौसम-ए-गुल पैरहन उतार आए

तिरी लगन ने ज़माने की ख़ाक छनवाई
तिरी तलब में तमाम आरज़ुएँ हार आए

ये फ़ख़्र कम तो नहीं कू-ए-यार में ‘निकहत’
न शर्मसार गए थे न शर्मसार आए