भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अब तक तो / रफ़ीक सूरज

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अब तक तो आ रहा है उजाला खिड़की से
और थोड़ी खुली हवा भी
अब तक तो दिखाई देता है चौकोर आकाश
सरसराते पेड़ों के सहारे खड़ा हुआ
सामने का खुला मैदान सचमुच धीरे-धीरे सिकुड़ता चला है
खेल में मगन बच्चों का कोलाहल भी सुनाई नहीं देता पहले की तरह

जगह जगह निशान पड़े हैं प्लॉटों के
कन्धे तक ऊँचाई वाले सीमेण्ट के खम्भे ज़मीन में गड़े हुए
और उन पर लिपटे कँटीले तार
कभी-कभी सुनाई देती हैं लॉरी से पत्थर गिरने की
ज़ोरदार आवाज़ें या ज़मीन में घुसने वाली बोअर मशीनें
अब तक तो सलामत है सामने का रास्ता
मन्दिर से आने वाली घण्टियों की आवाज़ या
प्रातःकाल की नीरव शान्ति में सुनाई देने वाली मस्जिद की अजान

जितना मुझे दिखाई देता है आकाश, उसकी लम्बाई-चौड़ाई में मुझे इतनी सी कमी भी अब मंज़ूर नहीं
खिड़की से नज़र आने वाले दृश्य में अब ज़रा-सी भी भीड़ मुझे नहीं बढ़ानी।

मराठी से हिन्दी में अनुवाद : भारतभूषण तिवारी