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अब तबस्सुम भी कहाँ हुस्न का इज़हार लगे / रवि सिन्हा

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अब तबस्सुम[1] भी कहाँ हुस्न का इज़हार[2] लगे
शाहिद[3]-ए-गुल कह दे बाग़ ये बाज़ार लगे

ग़र्क़े[4]-दरिया थे तहे-आब[5] सफ़र होना था
जो उधर ज़ीस्त[6] में डूबे तो इधर पार लगे

हाँ तग़ाफ़ुल[7] तो है उम्मीद मगर बाक़ी है
अपना होना भी न होना भी याँ दुश्वार लगे

रश्के[8]-फ़िरदौस[9] मुअ'ल्लक़[10] है तसव्वुर में जहान
जो उतर आए तो फिर रोज़ का संसार लगे

लड़खड़ाती सी चले है ये सरे-राहे-जदीद[11]
क़ौम ये अपनी क़दामत[12] से ही सरशार[13] लगे

ये ज़मीं ज़हर पिलाती है यहाँ पौधों को
और हैरत है तुम्हें बाग़ ये बीमार लगे

क़त्ल मासूम हुए तख़्त-नशीं है क़ातिल
मुझको ये मुल्क समूचा ही गुनहगार लगे

गो ज़लाज़िल[14] को गिराने थे मकानात सभी
क़स्र[15] जो एक खड़ा है वही मिस्मार[16] लगे

फ़िक्र का रंग तग़ज़्ज़ुल[17] में मिलाया जाये
अर्ज़े-उल्फ़त[18] भी उन्हें जग से सरोकार लगे

शब्दार्थ
  1. मुस्कान (smile)
  2. प्रकट होना (manifestation)
  3. गवाह (witness)
  4. डूबा हुआ (drowned)
  5. पानी के नीचे (under water)
  6. जीवन (life)
  7. उपेक्षा (neglect)
  8. ईर्ष्या (envy)
  9. स्वर्ग (paradise)
  10. टँगा हुआ (suspended)
  11. आधुनिकता के रास्ते पर (on the road to modernity)
  12. प्राचीनता (ancient-ness)
  13. नशे में (drunk)
  14. भूकम्प (बहु.) (earthquakes)
  15. भवन (mansion)
  16. तबाह (destroyed)
  17. ग़ज़ल का रंग (colour of the Gazal)
  18. प्रेम निवेदन (solicitation of love)