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अब तो बस अपनी ही ख़ातिर जीता यह संसार लगा / रंजना वर्मा

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अब तो बस अपनी ही खातिर जीता यह संसार लगा।
जिधर उठाई नजर उधर ही फैला अत्याचार लगा॥

सभी हाँकते अपनी-अपनी नहीं दूसरों की चिंता
स्वार्थ सिद्ध करने में अपना है मानव हर बार लगा॥

जिसे हितैषी समझा हमने नेता चुन कर कुर्सी दी
सिर्फ़ कमाने में दौलत ही उसका घर परिवार लगा॥

जनता मरती है मर जाये भरी तिजोरी हो उसकी
कर्तव्यों की बात भुला जो पाने में अधिकार लगा॥

दौरे पर दौरा करते हैं रोज हो रही पौ बारह
हर दंगा फसाद है इनको तो जैसे त्यौहार लगा॥

राजा राज करें जनता की भीड़ नहीं सुनता कोई
पीट रहा सिर हर बाशिंदा हर बेबस लाचार लगा॥

बार-बार जो गिरता है अंततः लक्ष्य पा लेता है
कर्महीन को लेकिन अपना गिरना यह बेकार लगा॥