भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अब मौसम है छुट्टी का / कमलेश द्विवेदी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आओ झूमें-नाचें-गायें अब मौसम है छुट्टी का।
चाहें जितनी मौज उड़ायें अब मौसम है छुट्टी का।

सुबह नहीं अब जल्दी उठना,
और न जाना है स्कूल।
डाँट-डपट सब टीचर जी की,
अब हम जायें बिलकुल भूल।
चाहें जैसे समय बितायें अब मौसम है छुट्टी का।
आओ झूमें-नाचें-गायें अब मौसम है छुट्टी का।

लूडो-कैरम-टेबल टेनिस,
खेलें चाहें जितने खेल।
कोई नहीं कहेगा हमसे-
नहीं पढोगे, होगे फेल।
चाहें जितनी धूम मचायें अब मौसम है छुट्टी का।
आओ झूमें-नाचें-गायें अब मौसम है छुट्टी का।

खूब मौज-मस्ती है करनी,
जब तक ख़त्म न होता जून।
अब चाहें हम शिमला जायें,
चाहें जायें देहरादून।
चाहें जहाँ घूमने जायें अब मौसम है छुट्टी का।
आओ झूमें-नाचें-गायें अब मौसम है छुट्टी का।