भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अब लकीरों की तसव्वुर से ठना करती है / रवि सिन्हा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अब लकीरों की तसव्वुर[1] से ठना करती है ।
अब बमुश्किल तिरी तस्वीर बना करती है ।

साँस लौटी है थके जिस्म की ख़बरें लेकर
काँपती लौ भी अँधेरे की सना[2] करती है ।

रौशनी बन के तिरी याद तो आती है मगर
हाफ़िज़े[3] में मिरे कोहरे से छना करती है ।

पेड़ बूढ़े थे तो दमभर न रुकी थी आँधी
सब्ज़ मौसम से उलझने को मना करती है ।

रूह रूपोश[4] हुई दैर[5] से कुछ शह पाकर
अब इबादत के सभी काम अना[6] करती है ।

शब्दार्थ
  1. कल्पना (imagination)
  2. प्रशंसा (praise)
  3. स्मरण-शक्ति (memory, capacity to remember)
  4. अदृश्य, फ़रार (hidden, absconding)
  5. पूजागृह (temple, place of worship)
  6. स्व, ख़ुदी (self, ego)