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अभिशाप / जय गोस्वामी

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तुम हो, अपने सुरक्षा घेरे में

तुम्हारे ही हुक़्म पर हत्यरा बना मैं
तुम्हारे ही हुक़्म पर छिपा रखा है मैंने
अपने भाई का शव । तुम्हारे ही कारण
घर बदर किया उनको ।

तुम्हें कोई हर्ज़ न हुआ ।

हत्यारा तुम्हें आज देता है अभिशाप
एक दिन देखना मेरी तरह तुम्हें भी
भागते फिरना होगा लोगों की नज़रों से
एक दिन छिन्न-भिन्न होगा जीवन तुम्हारा भी

हे राजा, तुम पर हमने घोर-घोर
किया था विश्वास, इसीलिए
तुमने हमारे लिए रख छोड़ा है
सिर्फ़ आत्मवंचना की राख-
सिर्फ़ राख ।

हम तुम्हारा चाहते हैं नाश
हम तुम्हारा चाहते हैं नाश ।

बांग्ला से अनुवाद : संजय भारती