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अलक विचुम्बित भाल / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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1
सिन्धु -तरंग
मोहे शशि अनंग
विचलित हो
फिर से लौट आती
सिन्धु में समाती।
2
सिर पटके
इन्द्रजाल-पाश- बँधी
चाँद न मिला
लज्जित लौट आई
सागर में समाई।
3
नैन विशाल
अलक विचुम्बित
शशि-सा भाल
चूमे सागर चाँद
बरसा अनुराग।
4
मादक रूप
दीपित घर -द्वार
मद छलका
बाहर भटका तू
मद की तलाश में !
5
प्राणों से चाहा
सौंपा था मधुमास
तन का भोगी
जाने क्या मन को
क्यों जागी है पीड़ा!
6
मुदित मन
संकोच-भरा तन
वाणी भी मौन
तुमको ही तो चाहें
कुछ कह न पाएँ।
7
दु:ख के घन
उमड़-घुमड़के
खुद ही डूबे
आँधी ने झकझोरे
फट पड़े बादल ।
-०-
(यात्रा 26 जून -18 -भारत से कैनेडा )