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अविनाशी और शाश्वत है अन्तरात्मा / काएसिन कुलिएव / सुधीर सक्सेना

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अविनाशी और शाश्वत है
रोटी और पानी, वृक्ष और घास की तरह
अन्तरात्मा । नारकीय लपटों में भी दहती नहीं
लेती फिर नवाकार ।

सिंहासन लुढ़क गए, धूल में मिल गए ताज
गढ़े गए नए विधि-विधान
चकनाचूर हो गए भव्य गिरजाघर
मगर जीवित रही अन्तरात्मा
जीवित रहा विवेक ।

सच है कि अग्निकाण्ड की दाहक लपटों में
और रक्तस्नात उत्सवों में, इसने
स्वयं को नतशिर महसूसा
जब मौक़े आए छल के, बल के
यह गोलमोल बोली या बोली बुदबुद ।

मगर यह कभी चुकी नहीं
भीषण युद्ध के दिनों में भी
इसने प्रेरित किया निडर शौर्य को
प्रेरित किया धरती पर शौर्य-गान को

जैसे घास, और रोटी, और पेड़, और आसमान
रहे हैं हमेशा, रहेंगे सदैव
वैसे ही मरेगी नहीं अन्तरात्मा कभी भी
और रहेगी इसीलिए कविता धरती पर सदैव ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुधीर सक्सेना