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आँख मे ख़्वाबघर है, और कुछ नहीं दिखता / विजय किशोर मानव

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आंख में ख़्वाबघर है, और कुछ नहीं दिखता
रोशनी हमसफ़र है, और कुछ नहीं दिखता

घुप अंधेरे में थी उम्मीद सहर होने की,
अब मगर दोपहर है, और कुछ नहीं दिखता

चले थे गांव से शहर की तरफ़ ख़ुश होकर
यहां ये खंडहर हैं, और कुछ नहीं दिखता

कहां टिकें ये पांव, और कितना बाएं चलें,
राह में सर पे सर हैं, और कुछ नहीं दिखता

रेत पर लिक्खा था इक मीठी नदी का सपना,
धूप है, जिस्म तर है, और कुछ नहीं दिखता