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आँख से अश्क भले ही न गिराया जाये / ललित मोहन त्रिवेदी

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आँख से अश्क़ भले ही न गिराया जाये !
पर मेरे गम को हँसी में न उड़ाया जाये !!

तू समंदर है मगर मैं तो नहीं हूँ दरिया !
किस तरह फ़िर तेरी दहलीज़ पे आया जाये !!

दो कदम आप चलें तो मैं चलूँ चार कदम !
मिल तो सकते हैं अगर ऐसे निभाया जाये !!

मुझे पसंद है खिलता हुआ, टहनी पे गुलाब !
उसकी जिद है कि वो, जुड़े में सजाया जाये !!

या तो कहदे कि है जंज़ीर, मुकद्दर मेरा !
या मुझे रक़्स का अंदाज़ सिखाया जाये !!

मेरे जज़्बात ग़लत, मेरी हर इक बात ग़लत !
ये सही तो है मगर कितना जताया जाये !!

लाख अच्छा सही वो फूल मगर मुरदा है !
कब तलक उसको किताबों में दबाया जाये !!

रोशनी तुमको उधारी में भी मिल जायेगी !
पर मज़ा तब है कि, जब घर को जलाया जाये !!