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आँख से बाहर निकल कर कोर पर ठहरा रहा / प्रमोद रामावत ’प्रमोद’

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आँख से बाहर निकल कर कोर पर ठहरा रहा ।
ज़िन्दगी पर आँसुओं का, इस तरह पहरा रहा ।
 
तुम तो आईना रहे, जिसमें हज़ारों अक्स थे
मैं रहा तस्वीर जिसमें, बस वही चेहरा रहा ।
 
थी ख़ुशी तो ओस का कतरा हवा में घुल गई,
ज़िन्दगी का दर्द से, रिश्ता बड़ा गहरा रहा ।
 
बस्तियाँ थीं उम्र की, तब थी सफ़र में रौशनी,
फिर अँधेरा ही अन्धेरा, जब तलक सहरा रहा ।
 
दर्द की एक बाढ़ यूँ, हमको बहा कर ले गई,
या तो हम चीख़े नहीं, या वक़्त ही बहरा रहा ।