भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आँगन-आँगन जारी धूप / ज़फ़र ताबिश

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आँगन-आँगन जारी धूप
मेरे घर भी आरी धूप

क्या जाने क्यूँ जलती है
सदियों से बिचारी धूप

किस के घर तू ठहरेगी
तू तो हैं बंजारी धूप

अब तो जिस्म पिघलते हैं
जारी जा अब जारी धूप

छुप गई काले बादल में
मौसम से जब हारी धूप

हो जाती है सर्द कभी
और कभी चिंगारी धूप

आज बहुत है अँधियारा
चुपके से आ जारी धूप