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आँसू से अभिनन्दन / अनिरुद्ध प्रसाद विमल

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उजड़ी मम सपनों की दुनिया
उजड़ा मेरा नन्दन वन ;
रे मीत बता किस तरह करुँ ?
मैं एक तुम्हारा अभिनन्दन !
गीतों की दुनिया में डूबा
गीत हुए न पूरे !
मीत मिला मनमाना ;
लेकिन सपने रहे अधूरे !
इंगित करता है मुझको
माहौल दुखों के क्षण का ;
कोई तो रखवाला होता
इस दर्दीले मन का।
जीने का एक संबल था,
वह भी किसने छीन लिया ?
जीवन के मधु प्याले को
कौन क्रूर था ? तोड़ दिया !
जिसको पाया, उसको खोया,
मूक मिलन की आशा में ;
संभल-संभल भी ठोकर खाया
नई-नई प्रत्याशा में।
आज विदाई का अभिनन्दन
आँसू से लिखकर देना है !
मेरे जीवन का लक्ष्य आखिरी
चुप-चुप कर बस रोना है।