भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आइने पे इताब कौन करे / रवि सिन्हा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आइने पे इताब[1] कौन करे
इस अना[2] को शराब कौन करे

कब तग़ाफ़ुल[3] तो कब नवाज़िश[4] थी
ज़िन्दगी से हिसाब कौन करे

ख़्वाब तक खींच ला हक़ीक़त को
नींद अपनी ख़राब कौन करे

आइना है तो सच दिखाएगा
उनकी जानिब[5] जनाब कौन करे

ख़्वाहिशे-क़ौसे-क़ुज़ह[6] सूरज को
ये समन्दर हबाब[7] कौन करे

धूल तारों की थी कभी दुनिया
अब यहाँ पा-तुराब[8] कौन करे

हाले-दिल क्यूँ बयाँ हो आँखों से
एक आतिश को आब कौन करे

दीदवर[9] भी तो एक पैदा हो
ख़ुश्क सहरा[10] सराब[11] कौन करे

सफ़र कट जाए बस जिसे पढ़ते
ख़ुद को ऐसी किताब कौन करे

शब्दार्थ
  1. ग़ुस्सा (anger)
  2. अहं (self)
  3. उपेक्षा (indifference, neglect)
  4. कृपा (kindness)
  5. तरफ़ (towards)
  6. इन्द्रधनुष की ख़्वाहिश (desire for rainbow)
  7. बुलबुला (water bubble)
  8. मिट्टी सने पैर (soiled feet)
  9. पारखी, देखने वाला (connoisseur, observer)
  10. सूखा रेगिस्तान (dry desert)
  11. मृगमरीचिका (mirage)