भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आगरा मैं थे क्रान्तिकारी / रणवीर सिंह दहिया

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

एक दिन राजगुरु एक महिला की तसवीर वाला एक कैलेंडर लाकर कमरे में टांग देता है। आजाद कैलेंडर देखकर नाराज होता है और उतार कर फैंक देता है। दोनों में कहासुनी होती है। क्या बताया भला:

आगरा मैं थे क्रान्तिकारी उस बख्त की बात सुणाउं मैं॥
आजाद और राजगुरु बीच छिड़या यो जंग दिखलाउं मैं॥

राजगुरु नै फोटो आला कलैण्डर ल्याकै टांग दिया
आजाद नै टंग्या देख्या अखाड़ बाढ़ै वो छांग दिया
बोल्या उलझ तसबीरां मैं फिसलैंगे न्यों समझाउं मैं॥
राजगुरु आया तो बूझया कलैंडर क्यों पाड़ बगाया
आजाद बोल्या क्रान्ति का क्यों तनै बुखार चढ़ाया
क्यों सुन्दर तसबीर पाड़ी यो सवाल बूझणा चाहूं मैं॥
सुन्दर महिला की थी ज्यांतै पाड़ी सै तसबीर मनै
दोनूं काम साथ ना चालैं पाई अलग तासीर मनै
राजगुरु भाई गुस्सा थूक दे कोन्या झूठ भकाउं मैं॥
एक गाडडी के दो पहिये बीर मरद बतलाये सैं
सुन्दरता बिना संसार किसा सवाल सही ठाये सैं
आजाद मुलायम हो बोल्या आ बैठ तनै समझाउं मैं॥