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आग की नदी / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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36
नैनों का जल
सागर–सा अतल
अमृत भरे हुए,
जिसने जाना,
निकला वह अपना
नहीं था वह बेगाना।
37
घट रीतेगा
समय भी बीतेगा,
न रीते नेह-सिन्धु,
ये रात-दिन
बढ़ता ही जाएगा
गहराई पाएगा।
38
पुण्यों की कोई
तो बात रही होगी
कि राहें मिल गईं,
जागे वसन्त
पाटल अधर पे
ॠचाएँ खिल गईं।
39
आग की नदी
युग बहाता रहा
झुलस गया प्यार,
वाणी की वर्षा
सबने की मिलके
हरित हुई धरा।
40
आएँगे लोग
उठे हुए महल
गिरा जाएँगे लोग,
शब्दों का रस
हार नहीं पाएगा
प्रेम-गीत गाएगा