भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आज़ादी का हल / बालकृष्ण काबरा 'एतेश' / लैंग्स्टन ह्यूज़

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब व्यक्ति करता है शुरू‏आत शून्य से
जब व्यक्ति करता है शुरू‏आत अपने हाथों से
ख़ाली किन्तु स्वच्छ
जब व्यक्ति शुरू‏ करता है दुनिया का निर्मा‌ण
वह शुरू करता है पहले स्वयं से
और उस श्रद्धा से जो उसके हृदय में है —
शक्ति भी
इच्छा-शक्ति भी वहाँ निर्मा‌ण के लिए।

हृदय में सबसे पहले होता है सपना —
फिर मस्तिष्क शुरू‏ करता है तलाश रास्ते की।
उसकी आँखें होती हैं दुनिया की ओर
विशाल वनों वाली दुनिया
उर्वर धरती वाली दुनिया
नदियों वाली दुनिया की ओर।

आँखों को दीख पड़ती है सामग्री निर्मा‌ण के लिए
दीख पड़ती हैं कठिनाइयाँ और अवरोध भी।
मस्तिष्क तलाशता है रास्ता इन अवरोधों को दूर करने के लिए।
हाथ तलाशते हैं औजार काटने को जंगल
जोतने को ज़मीन और दोहन करने को जल की शक्ति।
फिर हाथ तलाशते हैं सहायता के लिए दूसरे हाथ
हाथों का एक समुदाय सहायता के लिए —
फिर सपना नहीं रह जाता एक व्यक्ति का सपना
वह हो जाता है एक समुदाय का सपना।
केवल मेरा सपना नहीं, बल्कि हमारा सपना।
केवल मेरी दुनिया नहीं,
बल्कि तुम्हारी दुनिया और मेरी दुनिया,
दुनिया जो है उन सब हाथों की जो करते हैं निर्मा‌ण।

बहुत पहले, किन्तु बहुत ज़्यादा पहले नहीं,
आए थे जहाज़ समुद्र के उस पार से
आए थे उनमें तीर्थयात्री और उपासक,
जीवट और लुटेरे,
आज़ाद लोग और बँधुआ सेवक,
ग़ुलाम और उनके हुक़्मरान,
थे नए जो
नई दुनिया — अमेरिका के लिए !

तरंगित लहरों पर चल कर आर्इं दीर्घ नौकाएँ
जिनमें आए पुरु‎ष और उनके सपने, स्त्रियाँ और उनके सपने।
छोटे-छोटे जत्थों में एक साथ,
हृदय से जुड़ रहे थे हृदय,
हाथ से मिल रहे थे हाथ,
शुरू‏ किया उन्होंने अपने राष्ट्र का निर्मा‌ण।
कुछ थे मुक्त हाथ
तलाश रहे थे जो एक बड़ी आज़ादी,
कुछ थे बँधुआ हाथ
जिन्हें थी उम्मीद कि मिलेगी आज़ादी,
कुछ हाथ थे ग़ुलाम
जिन्होंने रखा था सुरक्षित अपने सीने में आज़ादी का बीज,
शब्द एक ही था हमेशा वहाँ :
आजादी।

फिर चले हल धरती पर —
मुक्त हाथों और ग़ुलाम हाथों
बन्धक हाथों और जीवट हाथों
कई हाथों ने चलाए हल और जोता उर्वर धरती को
रोपे पौधे और उगाया अन्न जिससे हुआ पोष‌ण अमेरिका का
उगाया कपास जिससे मिले वस्त्र अमेरिका को।
ठक-ठक कई हाथों ने चलाई कुल्हाडि़याँ पेड़ों पर
जिनने गढ़ा और आकार दिया अमेरिका की छतों को।
छप-छप नदियों और समुद्रों में चली नावें
जिनने दी गति और दिया परिवहन अमेरिका को
सड़-सड़ चले कोड़े और दौड़े घोड़े
अमेरिका के मैदानों में।

मुक्त हाथों और ग़ुलाम हाथों
बन्धक हाथों और जीवट हाथों
श्वेत हाथों और अश्वेत हाथों
सभी हाथों ने थामे हल
थामीं कुल्हाड़ियाँ, थामे हथौड़े,
चलाया नावों को, हाँका घोड़ों को
जिनसे मिला अनाज और मकान और मिली गति अमेरिका को।
इस तरह एकजुट श्रम से
इन सभी हाथों से तैयार हुआ अमेरिका।

श्रम ! इसी श्रम से बसे गाँव
बसे शहर, जो बने नगर।
श्रम ! इसी श्रम से चली नौकाएँ
चले पाल-जहाज और स्टीम-बोटें,
दौड़े वैगन और बग्घियाँ,
इसी श्रम से शुरू‏ हुए कारख़ाने
शुरू‏ हुए रेलमार्ग, शुरू‏ हुई फाउण्ड्रियाँ,
खुले हाट और बाज़ार, खुलीं दूकानें, खुले स्टोर,
साँचों में ढले और निर्मित हुए शक्तिशाली उत्पाद,
जो बिके दुकानों में, भरे गए गोदामों में,
और जहाज़ से भेजे गए दुनिया भर में :
इसी श्रम से — श्वेत और अश्वेत हाथों के श्रम से —
पैदा हुए सपने, मिली शक्ति और इच्छा-शक्ति,
और मिली राह अमेरिका के निर्मा‌ण की।
अब मैं यहाँ, तुम वहाँ।
अब यह है मैनहैटन, शिकागो,
सिऐटल, न्यू ऑर्लियन्स,
बॉस्टन और एल पैसो —
अब है यह यू० एस० ए०।

बहुत पहले, किन्तु बहुत ज़्यादा पहले नहीं, किसी ने कहा था :
सभी मनुष्य पैदा हुए हैं समान...
और स्रष्टा ने उन्हें प्रदान किए हैं
कुछ अनन्य अधिकार...
जीवन, मुक्ति और
ख़ुशी पाने का अधिकार
उसका नाम था जेफ़र्सन। तब भी थे ग़ुलाम वहाँ,
लेकिन ग़ुलामों के मन में भी था उस पर विश्वास,
और चुपचाप वे यह मानकर चले
कि उसने जो कहा वह है उनके लिए भी।
बहुत पहले की बात है,
किन्तु बहुत ज़्यादा पहले की बात नहीं, जब लिंकन ने कहा :
कोई भी मनुष्य इस योग्य नहीं
कि वह राज करे दूसरे मनुष्य पर
बिना उस दूसरे की सहमति के।
तब भी थे ग़ुलाम वहाँ,
लेकिन वे ग़ुलाम जानते थे मन-ही-मन
कि उसने जो कहा वह है हर-एक मनुष्य के लिए —
अन्यथा किसी के लिए भी इसका कोई अर्थ नहीं।
तभी किसी ने कहा :
ग़ुलामी में रहने की अपेक्षा
आज़ाद मर जाना बेहतर है।
वह था अश्वेत व्यक्ति, था जो ग़ुलाम
किन्तु आज़ादी के नाम पर कर गया पलायन
पर ग़ुलाम जानते थे
जो फ्रेडरिक डगलस ने कहा वही था सत्य।
हार्पर्स फ़ेरी में जॉन ब्राउन के साथ मरे नीग्रो।
जॉन ब्राउन को दी गई फाँसी।
गृहयुद्ध से पहले, दिन थे अन्धकारपू‌र्ण,
और कोई नहीं जानता था निश्चित रू‏प से
कि कब मनेगा आज़ादी का उत्सव।
कुछ थे आशंकित “यह क्या संभव है”.
कुछ जानते थे कि होगी जीत अवश्य।
गुलामी के उन अन्धेरे दिनों में
अपने सीने में रखे आज़ादी का बीज
गुलामों ने रचा एक गीत :
    रखो हल पर अपने हाथ ! थामो इसे !
इस गीत का आशय था बिल्कुल स्पष्ट : थामो इसे !
मिलेगी आज़ादी !
     रखो हल पर अपने हाथ ! थामो इसे !
और मिली यह रक्त सने, भीष‌ण युद्ध के बाद !
पर मिली यह !
कुछ को तो हमेशा की तरह अब भी था सन्देह
कि युद्ध अब हो जाएगा ख़त्म,
ग़ुलाम कर दिए जाएँगे मुक्त,
या कि बन जाएगा संघ राज्य।
पर अब हम जानते हैं कि यह सब कैसे हुआ।
एक राष्ट्र और जनता के अन्धकारपू‌र्ण दिनों में से
यह मिली कैसे अब हम यह जानते हैं।
जब युद्ध के बादल छँटे तो वहाँ से फूट पड़ा प्रकाश।
थी वहाँ विशाल वनों वाली धरती
और था जनसमूह एकजुट होकर राष्ट्र के रू‏प में।

अमेरिका एक सपना है।
कवि कहता है यह था एक वायदा।
जनता कहती है यह है वायदा, जो होगा पूरा।
जनता हमेशा नहीं कहती है बातें ऊँचे स्वर में,
न ही लिखती उन्हें काग़ज़ पर।
जनता बहुधा रखती है
ऊँचे विचार अपने हृदय की गहराइयों में
और कभी-कभी केवल भूलवश करती है उन्हें अभिव्यक्त,
कहती है उन्हें हकलाते हुए, रु‎कते-रु‎काते,
और लाती है उन्हें ग़लती से व्यवहार में।
जनता आपस में एक दूसरे को नहीं समझती हमेशा।
किन्तु कहीं न कहीं
रहता है हमेशा प्रयत्न समझने का
और प्रयत्न यह कहने का —
“तुम हो मनुष्य। हम सब मिलकर बना रहे हैं अपना राष्ट्र।’’

अमेरिका !
राष्ट्र हुआ निर्मित सम्मिलित रू‏प से,
सपना हुआ पल्लवित सम्मिलित रू‏प से,
रखो हल पर अपने हाथ ! थामो इसे !
यदि मकान अभी नहीं हुआ है पूरा,
तो निराश न हो निर्माता !
यदि संघर्ष में अभी भी नहीं मिली है विजय,
तो उदास न हो सिपाही !
है रू‏परेखा, विन्यास यहाँ,
जो बुना गया आरम्भ से ही
अमेरिका के ताने-बाने में :
      सभी मनुष्य पैदा हुए हैं समान।
कोई भी मनुष्य इस योग्य नहीं
कि वह राज करे दूसरे मनुष्य पर
बिना उस दूसरे की सहमति के।
ग़ुलामी में रहने की अपेक्षा
आज़ाद मर जाना बेहतर है।
किसने कही वे बातें ? अमरीकियों ने !
कौन है उन शब्दों का स्वामी ? अमेरिका !
कौन है अमेरिका ? तुम और मैं !
हम हैं अमेरिका !
कोई भी शत्रु जो हमारी सीमाओं पर पाना चाहेगा विजय
उन्हें नकार हमारी !
कोई भी शत्रु जो हमारी सीमाओं के भीतर
हमें तोड़ेगा और पाना चाहेगा विजय
उन्हें नकार हमारी !
आज़ादी !
    भाईचारा !
        जनतन्त्र !
इन महान शब्दों के सभी शत्रुओं को
नकार हमारी !

बहुत पहले
आज़ादी की ओर अग्रसर ग़ुलाम जनों ने
रचा था एक गीत :
रखो हल पर अपने हाथ ! थामो इसे !
उस हल ने इतिहास की ज़मीन को
जोतकर किया नया
जिसमें रोपा गया आज़ादी का बीज।
उस बीज से पैदा हुआ वृक्ष, हो रहा है विकसित,
होता रहेगा हमेशा विकसित।
वह वृक्ष है सभी के लिए,
सम्पूर्ण अमेरिका, सम्पूर्ण विश्व के लिए।
इसकी शाखाएँ फैलती रहें देने को आश्रय —
सभी जातियों के सभी लोगों को मिले इसकी छाँव।
रखो हल पर अपने हाथ ! थामो इसे !

अँग्रेज़ी से अनुवाद : बालकृष्ण काबरा ’एतेश’