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आजादी के बलि-बेदी चढ़लै लाखौं मागोॅ के सिन्दूर / नवीन चंद्र शुक्ल 'पुष्प'

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आजादी के बलि-बेदी चढ़लै लाखौं मागोॅ के सिन्दूर
लहुवोॅ सें लिखलोॅ आजादी के किस्सा घरेघर छै मशहूर

धू-धू धुँआवै मनोॅ में आगिन रहि-रहि औंटै परान
छल-छल छलकै ओकरा लेॅ आँखो देशोॅ लैं देलकै जे जान
दीया बारोॅ फूल चढ़ावोॅ शहीदोॅ रोॅ यादोॅ में भरपूर

सत्तावन के चिनगारी देलकै सैंतालिस में स्वराज
मिली-जुली केॅ राखोॅ भैया मैया अॅचरा रोॅ लाज
माय रो लाखों लाल मिटी गेलै अॅखी सें भेलै दूर

जलियाँवाला बागोॅ में गेलैं खौसलोॅ लहुबोॅ सें होली
कतेॅ माय के लालंे खाय लेलकै गोलो पर गोली
राखी पत्थर छाती माय नें करि लेखकै हाय सबूर

भयनें भाइये केॅ लुटे पीयै भाइये केरोॅ लहू
रोजे रोज देखै सुनै छी लुटि जाय छै बेटी-बहू
छाती फाटै देखी-देखी मारले जाय बेकसूर

युग-युग फहरेॅ झंडा तिरंगा गावोॅ मिली जन मन गान
देखों लेॅ छौ करना भैया तन-मन-धन बलिदान
देशोॅ केॅ आबेॅ फेनू नै बांटोॅ बाँटोॅ नै धरती एक्को धूर