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आजु देखली हम एक रे सपनमा / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

आजु देखली हम एक रे सपनमा।
सूतल हली[1] हम अपन कोहबरिया॥1॥
ओने से[2] अयलइ बाँके रे सिपहिया।
पकड़ि बाँधल मोरा पिया सुकमरिया॥2॥
छोडूँ छोडूँ दुलहा हे हमरो सिपहिया।
बिहरे[3] मोरा देखि बजर के छतिया॥3॥
जो तोहिं देहीं धानि बाला[4] रे जोबनमा।
छोड़िए देऊँ[5] तोहर पिया सुकमरिया॥4॥
पिया देखि देखि मोरा बिहरे करेजवा।
नयना ढरे जइसे बरसे समनमा॥5॥
टूटि गेलइ एतना में हमरा के नीनियाँ[6]
झरे[7] रे लागल जइसे झहरे समनमा[8]

शब्दार्थ
  1. थी
  2. उधर से
  3. विदीर्ण हो रही है, फट रही है
  4. कम उम्र की, कमसिन
  5. छोड़ दो
  6. नींद
  7. झरने
  8. श्रावण महीना