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आज तक जितना जिये हैं / हरीश भादानी

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आज तक जितना जिये हैं
बदनाम होकर ही जिये हैं !
इन बड़ी हवेलियों वाले बुर्जूगा बूढ़े
अपनी स्वर्ग यात्रा से पहले
हमें दो-चार थेगड़े ही दे गये होते
तो ढाँप लेते हम स्वयं को,
फटी चादर लिये कब तक छिपे रहते ?
आ गये-
नंगे अभावों का हुज़ूम लेकर
खूबसूरत दुनियाँ को सड़क पर;
हमारे पास क्या नहीं है-
सपने हैं,
धरती-सा कलेजा है,
इस आसमान से कहीं अच्छा मन है,
ऐसी असलियत में
आ गये हम तो क्या कयामत हो गई ?
रेशमी गिलाफ पर बीमार
लोगों की अँगुलियाँ
हम पर उठी हैं-
बारादरी से झांकें जा रहे
चेहरों पर सलवटें पड़ी हैं
और ताने भोंकते हैं !
सौंगन्ध है हमको हमारी सांस की
जो दूरियों तक जीना चाहती है,
ऊँचाइयों को-
जो बौना बनाना चाहती है,
गुम्बदों को
चूल्हों की चिमनियाँ बनाना चाहती है,
जो नकाबों को उलटना चाहती है,
बेडोलपन को
जो तरासा चाहती है
सौगन्ध ऐसी साथ की-
पहले से अधिक
बदनाम होकर भी जियेंगे !
दमखम से जियेंगे !!