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आज भी औरत तेरा कितना कसा संसार है / सूरज राय 'सूरज'

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आज भी औरत तेरा कितना कसा संसार है।
सर के ऊपर छत नहीं है चारसू दीवार है॥

सोचना क्या है मेरे भाई बचा कुछ भी नहीं
सर मेरा कांधे पर तेरे हाथ में तलवार है॥

तोहमतें रुस्वाइयाँ आँसू सज़ाएँ दर्दो-ग़म
ये कोई बस्ती नहीं है ये मेरा परिवार है॥

जिस्म के आगे कभी तूने इबारत न पढ़ी
सच कहूँ कुत्ते से भी बदतर तेरा किरदार है॥

खटखटा के रूह को कल दी किसी ने दस्तकें
पूछने पर बस ये बोला वह किरायेदार है॥

ग़ैर के आँसू को अपनी पुतलियों से पोंछना
ये कोई पागल नहीं है ये कोई अवतार है॥

जीतता है कौन देखें ख़्वाहिशो-ईमान में
इक तरफ़ सर है मेरा और इक तरफ़ दस्तार है॥

जंग रिश्तों से है मेरी क्या करूँ क्या न करूँ
जीतकर भी हारता हूँ, हार तो फिर हार है।

ग़म मेरे चौरास्तों पर कौन लेकर आ गया
कोई तो कोना मेरे घर का है जो ग़द्दार है॥

एक मुफ़लिस माँ को कितने बिस्तरों ने दी सदा
आ दवा ले जा तेरा बच्चा बड़ा बीमार है॥

रोशनी हो तो बदन की आड़ ले लेता है वो
देख ले "सूरज" अँधेरा किस क़दर हुशियार हैं॥