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आज मैं संहारक हूँ / लीना मल्होत्रा

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आज मैं संहारक हूँ

कि आज मेरे पास मत आना
मैं प्रचंड वायु
आज तूफ़ान में तब्दील हो रही हूँ..
निकल जाना चाहती हूँ
आज दंडकारन्य के घने जंगलों में
कुछ नए पत्तों की तलाश में जिनसे सहला सकूँ अपनी देह
जो मेरे झंझावत में फंस कर निरीह होकर उड़े मेरी ही गति से

अपनी सारी इच्छाएँ जिन्हें जलाकर धुएं में उड़ा देती थी मैं
आज बहुत वेग में उड़ा ले चली हैं मुझे
समय की परिधि से परे
मनु की नौका की पाल मैंने खोल दी है
और जोड़ो में बचाए उसके बीजो को नष्ट कर दिया है मैंने
मनु मै आज उसी मछली की ताक़त हूँ जिसके सींग से बाँधी थी नौका तूने
तेरे चुने शेष बचे एक बीज को अस्वीकार करती हूँ मैं
जाओ आविष्कार करो नए विकल्पों का नए बीजो का

मेरी इन्द्रियों को थामे हुए सातो घोड़े बेलगाम हो गए हैं
और मैं अनथक भागती हूँ
अपने दुस्साहस के पहिए पर
किसी ऐसे पहाड़ से टकराने के लिए जिसे चूर करके मैं अपने सौन्दर्य की नई परिभाषाएँ गढ़ लूँ
या जो थाम सके मुझे
ओ सामान्य पुरुष ! तू हट जाना मेरे रास्ते में मत आना !

मैं एक कुलटा हवा भागती फिर रही हूँ चक्रवात सी
सब रौंद कर बढती हूँ आगे
तेरी चौखट
तेरी बेड़ियाँ
तेरे बंद कमरे
बुझा दी है सुलगन अग्नि कुण्ड की
उड़ा के ले चली हूँ राख
आज मैं संहारक हूँ