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आज रात स्वर्गलोक से मैं / मरीना स्विताएवा

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आज रात स्वर्गलोक से मैं
अतिथि बनकर आई हूँ तुम्हारे देश में
मैंने देखे हैं उनींदे जंगल
और देखा है खेतों को गहरी नींद में सोए हुए ।

दूर कहीं रात मे
खुरों ने खोद रखी है घास,
भारी नि:श्वास छोड़ा है गाय ने
सोए पड़े मवेशीख़ाने में ।

सुनो, बताती हूँ तुम्हें
पूरी उदासी, पूरी विनम्रता के साथ
उस एक संतरी हंस
और सोई हुई हंसिनियों के बारे में ।

हाथ डूबे हुए थे कुत्ते के बालों में
कुत्ता था- अधेड़
फिर छह बजते-बजते
खुल गई थी रात ।

रचनाकाल : 20 जुलाई 1916

मूल रूसी भाषा से अनुवाद : वरयाम सिंह