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आज है वो सिर्फ़ रंजो-ग़म उठाने के लिए / दरवेश भारती

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आज है वो सिर्फ़ रंजो-ग़म उठाने के लिए
हर ख़ुशी क़ुर्बान की जिसने ज़माने के लिए

वक़्त ने हिम्मत बँधाई तो वो अब ख़ुशहाल हैं
वक़्त से बेबस थे जो आँसू बहाने के लिए

एक कौड़ी की मदद तक तो किसी ने की नहीं
जो भी आया कुछ न कुछ उसको सुनाने के लिए

कौन है अपना-पराया सोचकर रिश्ते बना
मुश्किलें पेश आयेंगी इनको निभाने के लिए

ऐशो-इश्रत में किसी को जो समझता था न कुछ
है तरसता आजकल वो दाने-दाने के लिए

दिल की शादाबी की ख़ातिर ही उसे चाहा बहुत
क्या ख़बर थी वो मिलेगा दिल दुखाने के लिए

ज़िन्दगी में जिसके हो जाओ उसी के ही रहो
दोस्ती करना न 'दरवेश' आज़माने के लिए