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आत्मकथा / नाज़िम हिक़मत

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यह आत्मकथा लिखी गई थी, 11 सितम्बर 1961 को, पूर्वी बर्लिन में

1902 में पैदा हुआ
फिर कभी नहीं लौटा वहाँ
जहाँ पैदा हुआ
मुझे पसन्द नहीं है लौटना
तीन साल बाद अलेप्पो में पाशा का पौत्र बना
19 बरस की उम्र में मसक्‍वा के कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय का छात्र
जब 49 का था तो फिर मसक्‍वा आया
पार्टी की केन्द्रीय कमेटी का मेहमान होकर
और चौदह बरस की उम्र से कविता में हूँ
मैं एक कवि

कोई जानता है घास की क़िस्मों के बारे में
तो कोई मछलियों की
और मैं जानता हूँ क़िस्में वियोग की
कोई जानता है तारों के नाम मुँहज़ुबानी
और मैं जुदाई के नाम

सोया मैं
बड़ी-बड़ी जेलों में और रहा बड़े-बड़े होटलों में
भूखा रहा और हड़ताल भी की
और शायद जानता हूँ मैं
स्वाद धरती के सभी पकवानों का भी
तीस साल का था
लटकाना चाहते थे जब मुझे फाँसी पर
और अड़तालिस का था
जब मिला मुझे विश्व शान्ति पुरस्कार
छत्तीस साल का था जब
छह महीनों में चला मैं सिर्फ़ चार वर्गमीटर
कँकरीट के फ़र्श पर अकेला
और उनसठ का था मैं
जब 18 घण्टों में प्राग से हवाना तक उड़ा

जीवित नहीं देखा लेनिन को
पर 1924 में श्रद्धाँजलि दी उन्हें निकट से
और 1961 में लगातार जाता रहा
लेनिन से मिलने
उनकी पुस्तकों के बीच समाधि पर

कोशिश की गई मुझे पार्टी से निकालने की
पर मैं निकला नहीं
तब उन्होंने उतार फेंके सारे आदर्श
उनके प्रयत्नों ने मुझे घायल तक नहीं किया

1951
एक युवा साथी के साथ समुद्र में
मैं मौत की तरफ़ चला

1952
टूटे हुए दिल से
लेटा रहा चार महीने कमर के बल
प्रतीक्षा करता रहा मौत की
भोगता रहा उन्मत्त ईर्ष्या
प्यार में पागल जवान स्त्रियों की तरह
पर डाह नहीं की किसी से भी
यहाँ तक कि चैपलिन से भी

औरतों को कभी-कभी धोखा दिया
दोस्तों को कभी नहीं
पीता हूँ लेकिन कभी झूमा नहीं
अल्लाह की दुआ है
कि अपनी रोटी कमाता हूँ आप ही

झूठ बोला — लज्जित था दूसरों की वजह से
झूठ बोला ताकि किसी को नाराज़ न करूँ
और कभी-कभी झूठ बोला मैंने
बिना किसी कारण के, यूँ ही

रेलगाड़ी में यात्रा की, कार में, हवाई जहाज़ में
दुनिया में अधिकांश लोगों के पास
इसके लिए पैसा नहीं है
’ओपेरा’ सुनने भी गया कई बार
ज़्यादातर लोगों ने यह शब्द सुना नहीं है

पर 1921 से
गया नहीं मैं ऐसी जगहों पर
जहाँ जाते हैं ज़्यादातर लोग दुनिया के
गिरजे में, मस्जिद में, मन्दिर में, ओझा के पास और ज्योतिषि के
हाँ, भविष्य अपना देखा कॉफ़ी की तलछट में

तीस-चालीस भाषाओं में छपता हूँ
तीस-चालीस देशों में
पर अपने ही देश तुर्की में
तुर्की भाषा में मेरी चीज़ें छापने पर लगा है प्रतिबन्ध

कैंसर नहीं हुआ मुझे कभी
क्योंकि इसका होना ज़रूरी नहीं
और कभी नहीं बनूँगा मैं प्रधानमन्त्री
सच कहूँ तो मैं यह चाहता भी नहीं

मोर्चे पर कभी नहीं रहा
रातों में छिपा नहीं बमवर्षा के समय
कभी हुआ नहीं किसी बमवर्षक का शिकार
साठ बरस तक प्यार करता रहा जीवन को

सँक्षेप में कहूँ, कामरेड !
हालाँकि आज बर्लिन में हाफँ रहा हूँ मैं
कुत्ते की तरह वियोग में
लेकिन जिया मैं मनुष्य की तरह
और जीऊँगा अभी

पर कौन जानता है
जीऊँगा
या सहूँगा

रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय