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आदमी के आदमी हाय बा खा रहल / चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह 'आरोही'

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आदमी के आदमी हाय बा खा रहल
कइसन रात दिन बा जा रहल

काँट से माली लगावत नेह बा
गम इहे जे फूल बा मुरझा रहल

भूख के मारे अँधेरा छा रहल
आदमी जे चान से आगे बढ़ल

स्वार्थ में सैतान के सरमा रहल
खा रहल बाटे जरह ई जान के

मौत के पगचाप नगिचा आ रहल
मीड़ से कट के अकेला हो गइल
चोट अपने आप बा सहला रहल