भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आदमी ज़िन्दा रहे किस आस पर / दरवेश भारती

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आदमी ज़िन्दा रहे किस आस पर
छा रहा हो जब तमस विश्वास पर

भर न पाये गर्मजोशी से ख़याल
इसक़दर पाला पड़ा एहसास पर

वेदनाएँ दस्तकें देने लगें
इतना मत इतराइये उल्लास पर

जो हो खुद फैला रहा घर-घर इसे
पायेगा क़ाबू वो क्या सन्त्रास पर

नासमझ था ,देखा सागर की तरफ़
जब न संयम रख सका वो प्यास पर

सत्य का पंछी भरेगा क्या उड़ान
पहरुआ हो झूठ जब आवास पर

दुख को भारी पड़ते देखा है कभी
आपने 'दरवेश' हास-उपहास पर