भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आदिवंश-अष्टक / अछूतानन्दजी 'हरिहर'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जय आदि ब्रह्म अवतारा 'छूत' और छल-माया से न्यारा।
जागे आदिम वंश हमारा, "छूत-विवर्जित" अछूत प्यारा॥
जै-जै आदिब्रह्म सब घट में, आत्मशक्ति चेतन जड़पट में।
है कारण उतपति निस्तारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
आतम-अनुभव आदिधर्म गति, सभी मतों की जो है उतपति।
जीवन मुक्ति ज्ञान दातारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
"एतद्देश प्रसूत अग्रजन्मा" "संस्कार से बने द्विजन्मा"।
मूल-वंश का सब विस्तारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
आदि-ज्ञान सत्भेद छिपाते, रूपान्तर संस्कृती बनाते।
करते हैं यो द्विज संस्कारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
मतवादी अपस्वार्थ चाल से, फांस फोड़ प्राचीन काल से।
नाश करै गुण-गौरव सारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
भेद वेद में वंश बड़ाई, विश्व-विजय भुलवाते भाई.
त्रैलोकी बलि छल से मारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
उठो! उठाओ! अब भी प्यारो, जगो! जगाओ! वंश उबारो।
बजा देओ फिर विजय नगारा, जागै आदिम वंश हमारा॥
आत्मिक, लौकिक दोनों मग में, पग धर भरो जोश रग-रग में।
 "संत" साम्य संगठन हमारा, जागै आदिम वंश हमारा॥