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आन्तरिक जीवन / मंगलेश डबराल

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मनुष्य एक साथ दो ज़िन्दगियों में निवास करता है। एक बाहरी और एक भीतरी। एक ही समय में दो जगह होने से उसके मनुष्य होने की समग्रता का ख़ाका निर्मित होता है। मेरा बाहरी जीवन मेरे चारों और फैला हुआ है। जहाँ भी जाता हूँ वह दिखता ही रहता है। बाहरी जीवन में बहुत सी क़िताबें हैं, अलमारियों में करीने से रखी हुईं शीशे के पल्लों के पीछे बन्द। दुनिया में धूल और कई तरह की दूसरी गन्दगियाँ बहुत हैं, इसलिए मैं उन्हें साफ करता, उलटता-पलटता, फ़ालतू लगने वाली क़िताबें छाँट कर अलग कर देता और फिर वापस अलमारी में सजा देता जैसे एक माली पौधों की बेतरतीब शाखों-पत्तों को काट-छाँट कर अलग कर देता है। इस तरह बाहरी जीवन एक बाग़ीचे की मानिन्द खिला हुआ दिखता। मेरे कई फ़ोटो भी इसी पृष्ठभूमि के साथ खींचे गए। अलमारी के एक कोने में कुछ ऐसे ख़ाने भी हैं, जहाँ कुछ कम रोशनी रहती, जिनमें शीशे नहीं लगे थे और ऐसे तमाम तरह के काग़ज़ जमा होते रहते जिन्हें बाद में या फुर्सत के वक़्त ज़्यादा गम्भीरता से देखने के मकसद से ठूँस दिया जाता। शायद उनमें ऐसे क्षणों के दस्तावेज़ थे जिन्हें मैं उड़ने या नष्ट होने से बचाना चाहता था। समय-समय पर जब उनकी तरफ निगाह जाती तो लगता कि वे बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन यह समझ नहीं आता था कि इनमें क्या है और फिर आश्चर्य होता कि यह सब अम्बार कब जमा होता रहा और क्यों इसकी छँटाई नहीं की गई और इसे करीने से रखने में अब कितना ज़्यादा समय और श्रम लगने वाला है। उन ख़ानों में रखी हुई फ़ाइलें फूल रही थीं, काग़ज़ बाहर को निकल रहे थे और वहाँ अब कुछ और ठूँसना मुमकिन नहीं था। अन्तत: मैंने उनकी सफ़ाई करने का बीड़ा उठाया, लेकिन जैसे ही उन्हें छुआ, आपस में सटाकर रखी गई फ़ाइलें गिर पड़ीं, बहुत सारे भुरभुराते काग़ज़ छितरा कर फट गए और धूल का एक बड़ा-सा बादल मेरे मुँह, नाक, आँखों और कानों में घुस गया। मैंने देखा, अरे यही है मेरा आन्तरिक जीवन जो बाहरी जीवन के बिलकुल बगल में रखा हुआ था, जो अब धराशाई है, जिसके काग़ज़ भुरभुरा गए हैं, अक्षरों की स्याही उड़ गई है, वाक्य इस क़दर धुँधले पड़ चुके हैं कि पढ़ने में नहीं आते और सब कुछ एक अबूझ लिपि में बदल चुका है।