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आफ़्रा ! तुम्हें शर्म नहीं आती, तुम अकेली रहती हो / लीना मल्होत्रा

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आफ़्रा को खींच लाने के सड़क के सारे प्रलोभन जब समाप्त हो गए
तो वह सड़क जो आहटों के लिए एक कान में तब्दील हो चुकी थी
अचानक उठकर आफ़्रा की देहरी पर आ गई है
और द्वार पर दस्तक दे कर पूछती है
क्या तुम्हें किसी की प्रतीक्षा है
नहीं
क्या तुम कहीं जाना चाहती हो
नहीं
क्या कोई आने वाला है
नहीं

आफ़्रा कहती है नहीं
और वह आँखें बन कर चिपक जाती है उसके घर की दीवारों पर
उन पर्दों के बीच लटक जाती है उसकी पगडंडियाँ
जो आफ़्रा की दुनिया को दो भागों में विभाजित करते थे ।

उसकी हैरान दृष्टि भेदती है
आफ़्रा के विचारो के कहीं ध्वस्त तो कही मस्त गाँव को
उसके अवशेषों में ढूँढ़ती है कहानियाँ और मस्ती में अश्लीलता
एक श्रृँखला में पिरोए हुए अलग-अलग सालों से टूट कर गिरे कुछ प्रचंड,
कुछ ख़ामोश लम्हे
वह बटन जो सूरज को बुझा देता है उसकी मर्ज़ी से
और वह अँधेरा जिसे वह घर की सब बाल्टियों, भगौनों और कटोरियों में इकठा करके रखती है

आगन्तुक के आने पर सबके छिपने की जगह नीयत है
लेकिन कोई नहीं भागता
और ढीठपने के साथ देखते है सड़क को घर का सामान बनते हुए ।

सब कुछ अचानक निर्वस्त्र हो गया है ।
और
आफ़्रा सोचती है इन खौलती आँखों से परे अपनी निष्ठा को कहाँ छिपाए

एक प्रतिक्रियाविहीन दाल और रोटी वह अपने इस अनचाहे अतिथि को परोसती है
तभी सड़क उससे पूछती है-
तुम क्यों जीती हो ?

आफ़्रा अचकचाकर कहती है-
सब जीते हैं, क्योंकि जीना पड़ता है
तुम गीत क्यों गाती हो ?
मुझे अच्छा लगता है
तुम्हे पता है तुम्हारे गुनगुनाने की आवाज़ बाहर तक सुनाई पड़ती है ?
आफ़्रा चुप

और तुम लड़की हो
अँधेरे मापती और अकेले गीत गाती लड़की कोई पसंद नहीं करता
कपड़े देखे हैं तुमने अपने

जानती हो लोग तुम्हारे बारे में क्या कहते है कि तुम. ..

इससे पहले कि वह बात पूरी करे आफ़्रा फट पड़ती है
बताती है उसे कि क्या कहते हैं लोग सड़क के बारे में ..

कि सड़क! तुम निम्फ हो और लाखों राहगीर गुज़रे है तुम्हारी राहों से
फिर भी तुम्हे न जाने कितने मुसाफ़िरों का इंतज़ार है.
क्या तुम थोड़ी और दाल लोगी ?

और आफ़्रा कटोरी से अँधेरा उलट कर दाल
और गिलास में भरी मस्ती बहा कर जल प्रस्तुत करती है
और तुम्हारी तो कोई मंज़िल भी नहीं है तो फिर क्यों बिछी रहती हो सड़क
किसके इंतज़ार में ?

वो कमबख्त ढीठ लम्हे, जो तिल-तिल जलने के आदी हो चुके हैं, ठठा कर हँसते हैं
और आफ़्रा को मुबारकबाद देते है
अकेले शहर में रहने वाली लड़की की भाषा को सीखने का जश्न मनाते हैं
सड़क भी आमंत्रित है
लेकिन सड़क लौट जाती है लगभग भागते हुए !

और रद्दी की टोकरी आफ़्रा पहली बार
देहरी के बाहर रख देती है
जिसमे ढेरो चरित्र-सर्टिफिकेट हैं जो उड़ कर आ गए थे उसी सड़क के रास्ते
और जिनका मूल्य है मात्र ५ रूपये किलो ।