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आरम्भिक यात्राएँ / पाब्लो नेरूदा

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पहली बार जब मैंने सागर की यात्रा की,
मैं अन्तहीन रहा,
मैं सारी दुनिया से उम्र में छोटा था।
और तट पर मेरा स्वागत करने को
विश्व की अनन्त टनटनाहट उठी।

मुझे दुनिया में होने का बोध नहीं था।
मेरी आस्था दफ़्न मीनार में थी।
बहुत कम उम्र में मैंने बहुत ज़्यादा चीज़ें पाईं थीं,
...
और तब मैंने समझा कि नग्न हूँ,
मुझे और कपड़ों से ढँकने की ज़रूरत है।
मैंने कभी गम्भीरता से जूतों के बारे में नहीं सोचा था।
मेरे पास बोलने के लिये भाषाएँ नहीं थीं।
सिर्फ़ ख़ुद की किताब ही पढ़ सकता था।
...
दुनिया औरतों से भरी पड़ी थी,
किसी दुकान की शीशों की खिड़की में लदे सामानों-सी
...
मैंने सीखा कि वीनस कोई दन्तकथा नहीं थी।
निश्चित और दृढ़ वह थी, अपनी शाश्वत दो भुजाओं के साथ,
और उसके कठोर मुक्ताफल ने
मेरी लैंगिक लोलुप धृष्टता सह ली।

अरुण माहेश्वरी द्वारा अँग्रेज़ी से अनूदित