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आशियाँ फिर से बुनो बिजली के तेवर के लिए / प्रमोद रामावत ’प्रमोद’

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आशियाँ फिर से बुनो बिजली के तेवर के लिए ।
जिस तरह मैंने चुना, अपना कफ़न सर के लिए ।
 
आईना बनकर खड़े हो जाओ उनके सामने,
फिर नहीं उठ पाएँगे वो हाथ पत्थर के लिए ।
 
मजलिसे तो सिर्फ़ नक़्क़ालों की होकर रह गई,
अब कोई मौक़ा नहीं बेबाक़ शायर के लिए ।
 
बस्तियों में कौन पालेगा, परिंदों को भला,
आशियाँ उनके उजाड़े, आपने घर के लिए ।
 
आप के गुलदान में यूँ, आपका चेहरा दिखा,
इक कबूतर मार डाला, सिर्फ एक पर के लिए ।
 
असल सूरत आपने आकर, अचानक देख ली
वरना मेरा दूसरा चेहरा है, बाहर के लिए ।