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आषाढ़ का एक दिन / लीना मल्होत्रा

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बरस रहा है आषाढ़ का एक दिन

वैसे नहीं जैसे बरसा था मल्लिका और कालिदास के बीच में
जिसमें पानी का बरसना भी एक ज़रूरी पात्र था
कालिदास की महत्वाकाँक्षा और मल्लिका के प्रेम जितना ज़रूरी
शहर में पानी का बरसना इसलिए ज़रूरी है
ताकि बारिश दौड़ते शहर के पाँवों में बेडिय़ाँ पहना सके
लोग ढूँढ़ सकें खोई हुई दिशाएँ
पूछ सकें अपना हाल कि कैसे हो भाई
देख सकें कि फूल किस रंग के खिले हैं

वृक्ष धुएँ से भरे अपने फेफड़ों को फुलाकर भत्र्सिका कर ले
अपने पत्तों की हथेलियों को फैला कर समेट सके बारिश की चहचहाहट
प्रेम में भीगी हुई लड़की अपने ग़ैरज़रूरी छाते को खोले चलती रहे किसी और दुनिया में
मोटरसाईकिल अपनी दोनों बाँहें फैलाए घुटनों तक डूबी सड़क को बलात्कार के सदमे से मुक्त करके गुदगुदा दे
उसके पहिए पानी उड़ाते हुए खिलखिलाते रहें
और उसकी ऊँची आवाज़ इस भयभीत शहर को यह दिलासा दे कि यह सन्नाटा टूटेगा
बरसता हुआ आषाढ़ का एक दिन भय और रोमांच की जुगलबंदी है
सड़क अपने खड्डों को पानी के नीचे यूँ छिपाती जैसे ग़रीबी के हस्ताक्षर को छिपाती है गृहिणी

फ़्लाईओवर के नीचे बैठे लोगों की आँखों का पानी ख़तरे के निशान से ऊपर बह रहा है
जिसमें डूब गए हैं खेत जिसमें वह धान रोप रहे हैं
अबके होगी जो फ़सल उससे वह एक सपना खरीद लाएँगे इस सफ़ेद शहर में
प्लास्टिक की पन्नी ओढ़े हुए एक छोटा बच्चा
चौराहे पर नंगे बदन भीख माँग रहा है
उसकी माँ ने उससे कहा है -- नहा लो फिर कब बरसे पता नहीं
बारिश में भीगते बच्चे को एक कुत्ता हाँफते हुए देख रहा है
और खग अपने भीगे पंखों को सिकोड़ पर उदासी का सन्नाटा रच रहा है
अपने कैमरे को बचाता एक फ़ोटोग्राफ़र
माईक के साथ बारिश की तड़प की गूँज को दबाता चिल्ला रहा है
ये है राजधानी की बारिश
ट्रैफ़िक जाम !